Saturday, 26 February 2011

माँ शारदे






बह रही है ज्ञान गंगा , तू भी इसमें हाथ धो ले
है तेरी खिदमत में कितने , डिग्री की दुकान खोले

भेद नहीं करती ये गंगा , कला व विज्ञानं में
कोई मेहनत की जरुरत , है नहीं स्नान में
ले ले प्रतिष्ठा डूब दे दे गंग के प्रधान बोले
है तेरी खिदमत में कितने , डिग्री की दुकान खोले

गंग तट पर भीर बहुत है पर न तू घबराना
खोल पाप की गठरी वही पञ्च डूब दे आना
जा के विमला गंग तरन की थोरी सि सामान लेले
है तेरी खिदमत में कितने , डिग्री की दुकान खोले

जब प्रतिष्ठा की डिग्रीया तेरे हाथ आएगी
माँ शारदे तेरी प्रगति देख कर जल जाएगी
बहुत कर चुकी फेल वो सबको अब तो थोरा वो भी रोले
है तेरी खिदमत में कितने , डिग्री की दुकान खोले;



पंकज बनगमिया

The above poem was composed by me when i was in my graduation (1994);
Cheating was rampant in university examinations in those days.
In my above poem the word "Vimla" denotes one of the famous Book Stalls of my native town SAHARSA.